महाभारत की मोदगिरी से मुंगेर के योगनगरी तक का सफर

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आनंद कुमार सिंह, मुंगेर

यह प्राचीन अंग प्रदेश का मुंगेर क्षेत्र है। इसे महाभारत काल में मोदगिरी के नाम से पुकारा जाता था। प्रभु श्रीराम ने यहीं पर ताड़का वध और माता सीता ने छठ व्रत किया था। महाभारत के यशस्वी पात्र कर्ण की दानशीलता की कहानी भी यहां से जुड़ी है।

:- मुंगेर के इतिहास में नया अध्याय

मुंगेर की गौरवगाथा में एक नया अध्याय जोड़ने के लिए बिहार योग विद्यालय का स्वर्ण जयंती वर्ष मनाया जा रहा है। बुधवार को शुरू हुए चौथे विश्व योग सम्मेलन में 56 देशों और देश के 23 प्रांतों के अतिथि योग के ज्ञानामृत का बड़ी तत्परता से पान कर रहे हैं। इससे पूर्व 1973 व 1993 में यहां दो योग सम्मेलन हो चुका है। पहला विश्व योग सम्मेलन 1953 में ऋषिकेष में स्वामी शिवानंद सरस्वती की अध्यक्षता में आयोजित किया गया था। इस बार सम्मेलन की अध्यक्षता स्वामी निरंजनानंद सरस्वती कर रहे हैं।

:- प्रसिद्ध योग गुरुओं को मिली है ऋषिकेष से प्रेरणा

आइए हम थोड़ा पीछे की ओर चलें। गंगा का उद्गम स्थल गंगोत्री विश्व के कुछ प्रसिद्ध योग गुरुओं की साधनास्थली रही है। यहीं पर स्वामी शिवानंद सरस्वती रहते थे। उनके बचपन का नाम कुप्पू स्वामी अय्यर था। 10 वर्षो तक मलाया में चिकित्सक का काम करने के बाद अध्यात्मिक प्रेरणा के कारण वे भारत आए। यहां स्वामी विशुद्धानंद को उन्होंने अपना गुरु बनाया।

:-विशुद्धानंद ने दिखाया शिवानंद को रास्ता

स्वामी विशुद्धानंद ने शिवानंद को हमेशा योग के प्रचार-प्रसार के लिए प्रेरित किया। गुरु के विचारों से प्रेरित होकर स्वामी शिवानंद सरस्वती ने डिवाइन लाइफ सोसाइटी की स्थापना की। इसकी ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया व दक्षिण अफ्रीका में शाखाएं हैं। स्वामी के शिष्यों ने पूरी दुनिया में योग और वेदांतों के प्रचार-प्रसार का कार्य किया है।

:- शिवानंद के शिष्य थे चिन्मयानंद और सत्यानंद

इन्हीं के प्रमुख शिष्यों में स्वामी चिन्मयानंद और स्वामी सत्यानंद सरस्वती प्रसिद्ध हुए। शिवानंद के योग ने विदेशों में काफी धूम मचाई। स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने ऋषिकेष में स्वामी शिवानंद सरस्वती को गुरु बनाया। गुरु के आदेश पर उन्होंने ‘योग का प्रचार-प्रसार, द्वारे-द्वारे-तीरे-तीरे’ करने का लक्ष्य बना लिया। इस दौरान परिव्राजक जीवन व्यतीत करते हुए स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने कई यात्राएं कीं।

:- कर्णचौरा से प्रभावित थे सत्यानंद

मुंगेर में वे कई स्थानों पर रुके लेकिन कर्णचौरा में उन्हें विशेष अनुभूति होती थी। यही कर्णचौरा दानवीर कर्ण से जुड़ा है। 1963 में स्वामी शिवानंद सरस्वती ने महा समाधि ली। इससे पूर्व इन्होंने स्वामी सत्यानंद सरस्वती को योग के प्रचार-प्रसार का आदेश दिया।

:- वसंत पंचमी को रखी गई विद्यालय की आधारशिला

वसंत पंचमी के दिन 19 जनवरी 1964 को सत्यानंद सरस्वती ने बिहार योग विद्यालय की स्थापना की। 1983 में उन्होंने अपना प्रभार स्वामी निरंजनानंद सरस्वती को सौंप दिया। इसके बाद रिखिया में रह कर स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने एक परमहंस साधक की कठोर जीवनशैली अपना ली। परमहंस साधना का निर्वहन करते हुए सत्यानंद सरस्वती ने कई उच्च वैदिक साधनाएं संपन्न कीं।

:- सत्यसंगानंद बनीं रिखियापीठ की पीठाधीश्वरी

2007 में उन्होंने स्वामी सत्यसंगानंद को रिखियापीठ की पीठाधीश्वरी नियुक्त किया और उन्हें अपने गुरु की तीन शिक्षाओं सेवा, प्रेम और दान को मूर्त रूप प्रदान करने का मिशन सौंपा।

:- बच्चों-वृद्धों पर विशेष ध्यान

2009 में महा समाधि में लीन होने के पहले उन्होंने तीन मुख्य आदेश दिए-रिखिया पंचायत के प्रत्येक बच्चे को एक समय का भरपेट पौष्टिक आहार उपलब्ध कराना, संन्यास पीठ की स्थापना और रिखिया में वयोवृद्धों के लिए आवासगृह का निर्माण। निरंजनानंद ने अपने सभी दायित्वों का उचित तरीके से निर्वहन किया। 2008 में उन्होंने बिहार योग विद्यालय की बागडोर स्वामी सूर्यप्रकाश सरस्वती को सौंप दी। इसके बाद स्वामी निरंजनानंद सरस्वती अपने गुरु के मिशन पर चलने को स्वतंत्र हो गए।

:- डाउनलोड करें दीक्षा का फॉर्म

यदि आप बिहार योग विद्यालय के शिक्षक से दीक्षा लेना चाहते हैं तो इंटरनेट पर इसके लिए फॉर्म उपलब्ध है। इस फॉर्म को डाउनलोड करने के लिए बिहार स्कूल ऑफ योग की वेबसाइट बिहारयोगाडॉटनेट पर जाकर दीक्षा पर क्लिक करें और दीक्षा का फॉर्म भरें। दीक्षा के प्रकार के अलावा आपको अपना नाम-पता भरना होगा। एक खास बात, आपको अपना नया अध्यात्मिक नाम भी चुनना होगा।

Source: http://www.jagran.com/bihar/munger-10815578.html

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